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उपेक्षित मन

रखा था मैंनै सहेज कर मन को, उस दरवाजे के पीछे लाल दराज में, जाने कहाँ गुम आज सुबह से वो, दिखाई देता नही क्या नाराज वो? कुछ कहा सुनी हुई नही मन से, जाने किसने छेड़ा आज उस मन को, दुखा होगा शायद दिल उसका भी, पहले तो ना था इतना नासाज वो! कल जब की थी उससे मैने बातें, तब खुश बड़ा दिख रहा था मन वो, आज अचानक है बीती उसपे क्या? बंद पड़ी आज क्यों आवाज वो? मन का हृदय भी होता है शायद! बात चुभी है क्या कोई उसको? या फिर संवेदना जग गई है उसकी! समझ सका नहीं मैं आवाज मन की? जैसे तैसे रख छोड़ा था मैंने उसको ही, लाल दराज के कोने मे दरवाजे के पीछे ही, सुध मैने ही ली नही कभी उसकी, उपेक्षा मेरे ही हाथों से हुई आज मन की? ओह ये क्या? मन तो यहीं पड़ा है! तकिए के नीचे शायद कुचल गया वो, आवाज रूंध चुकी है थोड़ी उसकी, कम हो रही रफ्तार मन के सांसों की! मन तो है मतवाला करता अपने मन की, मन की ना सुनो तो ये सुनता कहाँ किसी की, मन दिखलाता आईना आपके जीवन की, विकल होने पहले सुन लो तुम साज इस मन की!

जाने रहता वो किस तारे में

अम्बर के इस अंधियारे में, तलाशता हूँ मैं अपने तारे को, बिछड़ा मुझसे जो इस जीवन में, शून्य में जिसके मिट चुके हैं स्वर, धूलि में खोई जिसकी निशानी। गाता अब वो पार उस अंबर से, स्वर जिसके मिटे नहीं इस मन से, हृदय कंपित अब भी उस स्वर से, धूल कण सा उड़ता वो मानस में, स्वर गुम हुई वो जाने किस तारे में। था इस जीवन का आधार वो, पल में छूटा ना जाने कैसे हाथ वो, कहते हैं अब रहता अंबर पार वो, कभी दिखता किसी तारे में वो, तलाशता अंबर का मैं तारा वो। लाखों तारे टकते इस अंबर मे, धूलकण वो जाने किस तारे में, संगीत गुमशुम जाने किस शून्य में, नीर नीर सी छलकी आँखों में, जाने रहता वो अब किस तारे में।