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नारी: ईश्वरीय एहसास

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एहसास खूबसूरती का जब ईश्वर को हुआ, श्रृष्टि निर्माता ने तब ही जन्म स्त्री को दिया। इक एहसास कोमलता का जब हुआ होगा, तब  उसने स्त्री का कोमल हृदय रचा होगा। जग के भूख प्यास की जब हुई होगी चिन्ता, तब उसने माता के आँचल में दूध भरा होगा। जब एहसास कोमल भाव की मन में जागी, ममत्व, स्त्रीत्व, वात्सल्य तब नारी को दिया। धैर्य, संकल्प, सहनशीलता, भंडार ग्यान का, सम्पूर्ण रूपेण नारी को उसने दे दिया होगा। चाँदनी का घमंड तोड़ने को ही शायद उसने, अकथनीय अवर्णनीय सुन्दरता नारी को दी। सुन्दरता को परिभाषित करते करते उसने, नारी रूप की परिकल्पना कर डाली होगी।

शाम कुछ यहाँ कुछ वहाँ

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हुई है शाम दोनो तरफ, कुछ यहाँ भी और वहाँ भी, पल रहे अरमान दोनों तरफ, इक यहाँ और इक वहाँ भी, सिलसिले तन्हाईयों के अब हैं,  कुछ यहाँ भी और कुृछ वहाँ भी। इक सपना पल रहा यहाँ, एक पल रहाँ वहाँ भी, नींद आँखों से है गुमशुदा, कुछ यहाँ और कुछ वहाँ भी, धड़कनें की जुबाँ अब बेजुबाँ हैं,  कुछ यहाँ भी और कुृछ वहाँ भी। ख्वाब आँखों मे पल रहे हैं, कुछ  यहाँ और कुछ वहाँ भी। बजती है मन में शहनाईयाँ, अब यहाँ और वहाँ भी, गीत साँसों मे अब बज रही है,  कुछ यहाँ भी और कुृछ वहाँ भी। कतारें रौशनी की अब, कुछ यहाँ भी कुछ वहाँ भी। इंतजार उस पल का, अब यहाँ भी वहाँ भी, शाम ढल रही अब तुम बिन,  कुछ यहाँ भी और कुृछ वहाँ भी।

अनुभव मीठे हो जाते

अनुभव मीठे हो जाते, तुम साथ अगर दे देते। राह सरल हो जाता, तुम साथ अगर दे देते। उबड़ खाबर इन रास्तों पर, दूभर सा लगता जीवन का सफर, पीठ अकड़ सी जाती यहाँ, टूट जाते है अच्छे-अच्छों के कमर। सफर सरल हो जाता, तुम साथ अगर दे देते। अनुभव मीठे हो जाते, तुम साथ अगर दे देते। टेढे मेढे रास्ते ये जीवन के, अनुभव कुछ खट्टे मीठे मिलेजुले से, तीते लगते कुछ फल बेरी के, दाँत कटक जाते हैं अच्छे-अच्छों के। अनुभव मीठे हो जाते, तुम साथ अगर दे देते। सफर सरल हो जाता, तुम साथ अगर दे देते।

उदास शाम

ढ़ल रही अब शाम, आज कांतिहीन उदास, भूला सा भ्रमित मैं, आज खुद अपने पास! छिटक गई है डोर जैसे उस चिर विश्वास की, टूट गई है साँस ज्यूँ उर के हास विलास की! धुंध में सहमी सी है अाज शाम उदास क्लांत, कितना असह्य अब ये एकाकीपन का एकांत! घुटन सी इन साँसों में, मन कितना अशांत, अवरोध सा ऱक्त प्रवाह में. हृदय आक्रान्त । हौले हौले उतर रहा, निर्मम तम का अम्बार, अपलक खुले नैनों में, छुप रहा व्यथा अपार। सौ-सौ संशय मन में, लेकिन शाम है उदास, टूट है वो धागा जिसमें मेरी आस्था मेरी आस|

तुुम मैं होती, मैं तुम होता

कभी सोचता हूँ! मैं मैं न होता, तेरा आईना होता! तो क्या क्या होता इस मन में? क्या गुजरती तुझपर मुझपर जीवन में? तुम देखती मुझमें अक्श अपना, हर पल होती समीक्षा जीवन की मेरी, तेरे आँसूँ बहते मेरी इन आँखों से, तुम हँसती संग मैं भी हँस लेता, रूप तेरा देखकर कुछ निखर मैं भी जाता, मेरा साँवला रंग थोड़ा गोरा हो जाता। कभी सोचता हूँ! तुम तुम न होती, मेरी प्रतीक्षा होती! तो क्या क्या घटता उस पल में? क्या गुजरती तुझपर मुझपर जीवन में? द्वार खड़ी तुम देखती राह मेरी, मैं दूर खड़ा दैेखता मुस्काता, इन्तजार भरे उन पलों की दास्ताँ, तेरी बोली में सुनता जाता, खुश करने को तुम्हें वापस जल्दी आता, मैं पल पल इंतजार के तौलता। कभी सोचता हूँ! तुुम मैं होती, मैं तुम होता....

जाने रहता वो किस तारे में

अम्बर के इस अंधियारे में, तलाशता हूँ मैं अपने तारे को, बिछड़ा मुझसे जो इस जीवन में, शून्य में जिसके मिट चुके हैं स्वर, धूलि में खोई जिसकी निशानी। गाता अब वो पार उस अंबर से, स्वर जिसके मिटे नहीं इस मन से, हृदय कंपित अब भी उस स्वर से, धूल कण सा उड़ता वो मानस में, स्वर गुम हुई वो जाने किस तारे में। था इस जीवन का आधार वो, पल में छूटा ना जाने कैसे हाथ वो, कहते हैं अब रहता अंबर पार वो, कभी दिखता किसी तारे में वो, तलाशता अंबर का मैं तारा वो। लाखों तारे टकते इस अंबर मे, धूलकण वो जाने किस तारे में, संगीत गुमशुम जाने किस शून्य में, नीर नीर सी छलकी आँखों में, जाने रहता वो अब किस तारे में।

जीवन की खोह ये अजीब सी

चले जा रहे हैं हम, न जाने किस खोह में, बढी़ जा रही जिन्दगी, न जाने किस खोज में, है ये यात्रा अनंत सी, न जाने किस ओर में। मंजिलो की खबर नहीं, न रास्तों का पता, ये कौन सी मुकाम पर, जिन्दगी है क्या पता, यात्री सभी अंजान से, न दोस्तों का है पता। खोह ये अजीब सी, रास्ते कठिन दुर्गम यहाँ, चल रहें हैं सब मगर, इक बोझ लिए सर पे यहाँ, पाँव जले छाले पड़े, पर रुकती नही ये कारवाँ। एक पल जो साथ थे, साथ हैं वो अब कहाँ, एक एक कर दोस्तों का, अब साथ छूटता यहाँ, सांसों की डोर खींचता, न जाने कौन कब कहाँ। दिशा है ये कौन सी, जाना हमें किस दिशा, भविष्य की खबर नहीं, गंतव्य का नहीं पता, असंख्य प्रश्न है मगर, जवाब का नहीं पता। कण मात्र है तू व्योम का, इतने न तू सवाल कर, तू राह पकड़ एक चल, उस शक्ति पे तू विश्वास कर, हम सब फसे इस खोह में, चलना हमें इसी डगर। मुक्ति मिलेगी खोह से, तू चलता रहा अगर, ईशारे उस पराशक्ति के, तू समझता रहा अगर, खिलौने उस हाथ के, जाना है टूट के बिखर।