तुुम मैं होती, मैं तुम होता
कभी सोचता हूँ! मैं मैं न होता, तेरा आईना होता! तो क्या क्या होता इस मन में? क्या गुजरती तुझपर मुझपर जीवन में? तुम देखती मुझमें अक्श अपना, हर पल होती समीक्षा जीवन की मेरी, तेरे आँसूँ बहते मेरी इन आँखों से, तुम हँसती संग मैं भी हँस लेता, रूप तेरा देखकर कुछ निखर मैं भी जाता, मेरा साँवला रंग थोड़ा गोरा हो जाता। कभी सोचता हूँ! तुम तुम न होती, मेरी प्रतीक्षा होती! तो क्या क्या घटता उस पल में? क्या गुजरती तुझपर मुझपर जीवन में? द्वार खड़ी तुम देखती राह मेरी, मैं दूर खड़ा दैेखता मुस्काता, इन्तजार भरे उन पलों की दास्ताँ, तेरी बोली में सुनता जाता, खुश करने को तुम्हें वापस जल्दी आता, मैं पल पल इंतजार के तौलता। कभी सोचता हूँ! तुुम मैं होती, मैं तुम होता....