अनछुआ शब्द
मैं अनछुआ शब्द हूँ एक! किताबों में बन्द पड़ा सदियों से, पलटे नही गए हैं पन्ने जिस किताब के, कितने ही बातें अंकुरित इस एक शब्द में, एहसास पढ़े नही गए अब तक शब्द के मेरे। एक शब्द की विशात ही क्या? कुचल दी गई इसे तहों मे किताबों की, शायद मर्म छुपी इसमे या दर्द की कहानी, शून्य की ओर तकता कहता नही कुछ जुबानी, भीड़ में दुनियाँ की शब्दों के खोया राह अन्जानी। एक शब्द ही तो हूँ मैं! पड़ा रहने दो किताबों में युँ ही, कमी कहाँ इस दुनियाँ में शब्दों की, कौन पूछता है बंद पड़े उन शब्दों को? कोलाहल जग की क्या कम है सुनने को? अनछुआ शब्द हूँ रहूँगा अनछुआ! इस दुनियाँ की कोलाहल दे दूर अनछुआ, अतृप्त अनुभूतियों की अनुराग से अनछुआ, व्यक्त रहेगी अस्तित्व मेरी "कविता काव्य" में अनछुआ, अपनी भावनाओं को खुद मे समेट खो जाऊँगा अनछुआ।